मेरा गाँव भारत के सवा छः लाख गाँवो में से एक, बिहार के सीवान जिला के १५१९ गाँवो में से एक, रघुनाथपुर प्रखंड के ८५ गाँवो में से एक है। बिहार के दक्षिण छोर पे घाघरा नदी के तट पे बसा है। इस गाँव का नाम आदि काल में नरवल गढ़ हुआ करता था और यहाँ का राजा नल और रानी दमयन्ती राज करते थे। राजा नल के पोते नरवर के नाम पर नरवल गढ़ नरहन के नाम में बदल गया ।
गावं का पतन :-
राजा नल के अन्दर अहंकार समागया और वो धर्म का विरोध करने लगे, साधू सन्यासी, देवी-देवताओं का अनादर करने लगे जिसके चलते इस गावं का पतन हुआ।
गावं का पुनरउत्थान :-
महाराणा प्रताप के मृत्यु के बाद सिसोदिया वंश के कुछ राजपूत मेवार गढ़ छोड़ कर यहाँ आगये, और तिन गावों में (नरहन, सिसवन, कुसैला) बस गए और यहीं खेती-बारी करने लगे। आज भी तीनो गावों में भाईचारा और एक दुसरे के प्रति सम्मान है। इस तरह नरहन गावं सोलहवी शताब्दी में राजपूतों का गावं के रूप में उदय हुआ.
महाराणा प्रताप के मृत्यु के बाद सिसोदिया वंश के कुछ राजपूत मेवार गढ़ छोड़ कर यहाँ आगये, और तिन गावों में (नरहन, सिसवन, कुसैला) बस गए और यहीं खेती-बारी करने लगे। आज भी तीनो गावों में भाईचारा और एक दुसरे के प्रति सम्मान है। इस तरह नरहन गावं सोलहवी शताब्दी में राजपूतों का गावं के रूप में उदय हुआ.